शनिवार, 18 नवंबर 2017 | By: kamlesh chander verma

माँ बाप।।

जो थे रोशन  चिराग कभी घर के,
कैसे देहरी के बुझे दिये हो गये।
जिनके बिना सभी रचनाएं थी अधूरे ,
कैसे जिंदगी के हाशीये हो गये ।।
तुम्हारे लिए  ही वक़्त उनके पास था,
आज वक़्त नहीं है उनके लिए,
घर घर नहीं बन पाएगा बिन माँ बाप के,
फिरता रहे बेरुखी के तिनके लिए।
ये ना भूलेंगे तुझे ता उम्र भर ,
भूल जाएंगे वो इनको भूला जिनके लिएll
कैसे छोड़ दोगे इनको उनके हाल पर,
भविष्य तेरा भी लिखा है दीवाल पर।
फिर क्या है मज़बूरी कैसा ईमान है,
मां बाप के साथ ही,इंन्सान क्यूं बेईमान है।
झूठी तरक्की के इस दौड़ में,
मतलबपरस्ती की घुड़ दौड़ में,
छूने की चाहत  में  क्यूं आसमान है।।
कमलेश,लानतें ज़रूर देगा ये ज़माना,
माँ बाप को भुलाना/रुलाना नही आसान  है।।